पिचाश का जूनून

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पिछाश का जुनून(The Madness of the Eighties)साल था 1987। छोटा सा शहर, जहाँ सड़कों पर अभी भी साइकिलों का राज था और मोहल्ले की एकमात्र टीवी के सामने हर शाम भीड़ लगती थी। उस भीड़ में सबसे आगे बैठने वाला लड़का था—बंटी। बंटी को फिल्मों का ऐसा जुनून था कि लोग कहते, "इस लड़के के सिर में तो पिछाश (पिक्चर) ही सवार है।"बंटी का असली नाम सुरेंदर था, लेकिन किसी को उस नाम से नहीं जानता था। पूरा मोहल्ला उसे बंटी बुलाता। उसके पिता सरकारी स्कूल में मास्टर जी थे, सख्त मिजाज के इंसान। हर दिन वह बंटी को डांटते,