मैंने कहा—“चलो ठीक है… सफर का आनंद लेते हैं।लो, तुम लोग भी मूंगफली खाओ…”इतना कहकर मैंने मूंगफली का लिफाफा उनकी तरफ बढ़ा दिया।अंकिता ऊपर वाली सीट से नीचे उतरी और2–3 मूंगफली उठाकर खाने लगी।तभी प्रियांशी मुस्कुराते हुए बोली—“और बताओ अंकिता, सफर कैसा लग रहा है?”अंकिता ने उत्साह से कहा—“मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा है…मैं पहली बार दोस्तों के साथ सफर कर रही हूँ।”फिर थोड़ी देर रुककर बोली—“सच में, मैंने सफर तो बहुत किया है…लेकिन हमेशा मम्मी-पापा के साथ ही।”हमारी बर्थ पर दो और यात्री भी बैठे हुए थे।उन्होंने हमारी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए पूछा—“अरे, तुम लोग कहाँ जा रहे