बिल्ली जो इंसान बनती थी - 13

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शानवी ने जल्दी-जल्दी अपना बैग पैक किया। कपड़े…ज़रूरी सामान…और कुछ यादें…लेकिन एक चीज़ उसने जानबूझकर पीछे छोड़ दी  टुक-टुक। उसकी आँखें नम थीं…पर इस बार उसने खुद को रोने नहीं दिया।वो बोली - मुझे दूर जाना ही होगा…।और वो घर छोड़कर चली गई।दूसरी तरफ…कार्तिकेय…फिर से बिल्ली बन चुका था। वो उसी घर के कोनों में घूमता रहा। कभी दरवाज़े के पास बैठता…कभी उस बिस्तर पर जाता…जहाँ शानवी सोती थी। वो बार-बार म्याऊँ करता…लेकिन…अब कोई जवाब नहीं आता था। धीरे-धीरे वो बाहर निकल गया। सड़क पर…अकेला…भटकता हुआ। उसकी आँखों में आँसू थे।वो बोला - मैंने… सब खो दिया…।Beckground में song चल रहा था