भाग 3: बादलों की लुका-छिपी और खुलते राज़रविवार की सुबह कबीर की आँखें उम्मीद से पहले ही खुल गईं। उसने सबसे पहले अपनी खिड़की का परदा हटाया। बाहर तेज़ धूप खिली हुई थी। आसमान एकदम साफ और नीला था, जैसे कोई कलाकार ताज़ा कैनवास बिछाकर चला गया हो। कबीर के चेहरे पर मायूसी छा गई। ज़ोया ने कहा था—"अगर बारिश हुई, तो मैं मिलूँगी।"उसने अपनी अलमारी से एक कैज़ुअल शर्ट निकाली, पर फिर रुक गया। "शायद वह नहीं आएगी," उसने खुद से कहा और वापस अपनी ऑफिस की फाइलों की ओर मुड़ गया। पर उसका मन बार-बार उस नीले पक्षी