समय का सौदागर।

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शहर के पुराने हिस्से में एक बहुत छोटी-सी घड़ी की दुकान थी। बाहर से देखने पर वह दुकान किसी साधारण, भुला दिए गए कोने जैसी लगती थी। धूल से ढकी कांच की खिड़की, दीवारों पर पीतल की पुरानी घड़ियां, लकड़ी के काउंटर पर रखी कुछ टूटी हुई घड़ियां, और पीछे एक झुके हुए बूढ़े आदमी की शांत आकृति। लोग उसे अक्सर “घड़ी वाला काका” कहकर पुकारते थे। उसका असली नाम हर कोई नहीं जानता था। जिन लोगों ने भी जाना, उन्होंने उसे एक ही नाम दिया। समय का सौदागर।यह नाम मजाक में नहीं पड़ा था। वह आदमी घड़ियां ठीक करने