चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 10

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लेखक - एसटीडी मौर्य ️ कटनी मध्य प्रदेश अंकिता बिना कुछ सोचे-समझे मेरे पास आ गई।मैंने तुरंत मज़ाक में उसके कान पकड़ लिए—जैसा कि पापा ने इशारा किया था।अंकिता चिल्लाते हुए बोली—“अरे भैया! कान छोड़ो… दर्द हो रहा है!”फिर पापा की तरफ देखकर बोली—“देखो पापा! भैया मेरे कान पकड़ लिए हैं, छोड़ ही नहीं रहे!”मम्मी भी मुस्कुराते हुए बोलीं—“अरे नालायक! मेरी बेटी का कान तो छोड़ दे।”यह सब देखकर प्रियांशी चुपचाप मुस्कुरा रही थी।उसे हमारा यह अपनापन और मस्ती बहुत अच्छा लग रहा था।फिर वह हल्के से बोली—“अरे, अंकिता का कान छोड़ दीजिए…नहीं तो जब यह ससुराल जाएगी, तब आप ही रोने