खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 20

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"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"भाग 20: “मौत के साए से वापसी… और आख़िरी सबूत”रचना : बाबुल हक़ अंसारीपिछले खंड से…“अब वो वहाँ है… जहाँ तुम्हारी पहुँच नहीं।”और फिर गूँजी वो आवाज़… जिसने सब कुछ थाम दिया। गोली… और रहस्यकमरे के अंदर धुआँ भर गया था।नकाबपोशों ने चारों तरफ़ देखा —फर्श पर खून के छींटे थे… लेकिन शेखर दत्त वहाँ नहीं थे।एक गुंडा चिल्लाया —“भाग नहीं सकता वो बूढ़ा! ढूंढो उसे!”लेकिन उन्हें सिर्फ़ टूटी कुर्सियाँ, बिखरे काग़ज़… और खाली खिड़की मिली।दरअसल…गोली चलने से पहले ही शेखर दत्त ने खिड़की से छलांग लगा दी थी।उनका कंधा ज़ख्मी हुआ… लेकिन वो बच गए।  छुपा