मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 39

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पटना के बाहरी इलाके में, पटना के पास, गंगा नदी के शांत किनारे पर खड़ी वह हवेली अब पहले जैसी नहीं रही थी। जिस हवेली को लोग “भूतिया हवेली” कहकर दूर से ही नजरें फेर लेते थे, वही हवेली अब एक अनकही शांति में डूबी हुई थी। लेकिन यह शांति उतनी सरल नहीं थी, जितनी बाहर से दिखती थी।अध्याय: मुक्ति के बाद की छायाराकेश ने उस रात के बाद हवेली छोड़ने का फैसला तो कर लिया था, लेकिन जाने क्यों उसके कदम बार-बार रुक जाते थे। जैसे कोई अदृश्य डोर उसे बांध रही हो। मनीष तो अगले ही दिन पटना