खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 19

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"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"भाग 19: “डायरी का राज़… और मौत का सच”      रचना: बाबुल हक़ अंसारीपिछले खंड से…“नाम ही नहीं…पूरा सच है।”  डायरी का खुलासाकॉलेज के एक सुनसान कमरे में चारों बैठे थे —अनया, आर्या, नीरव… और शेखर दत्त।कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि पन्ने पलटने की आवाज़ भी भारी लग रही थी।शेखर दत्त ने डायरी खोली और धीमे स्वर में पढ़ना शुरू किया —“अगर ये डायरी कभी बाहर आई, तो समझ लेना…मेरी हार मेरी हार नहीं थी,और मेरी मौत… एक हादसा नहीं।”अनया के हाथ काँपने लगे।“मौत… हादसा नहीं?”  साज़िश का असली चेहराशेखर दत्त ने अगला