वर्शाली सरमाते हूए एकांश से कहती है--> एकांश जी ! मैं भी आपसे बहुत प्रेम करती हूं । मेरा सब कुछ आपका है। मैं भी आपके बिना नही रह सकती एकांश जी। इतना बोलकर वर्षाली एकांश से लिपट जाती है। और फिर मायूस होकर कहती है--> ये तु क्या कर रही है वर्शाली । तु यहां किस कार्य से आयी है और तु क्या कर रही है। एक मनुष्य से तु प्रेम कैसे कर सकती है। तु ये कैसे भूल गयी के तु एक परी है और एकांश एक मनुष्य ! तुम दौनो का मिलन कभी नही हो सकता। अपने आप