नवंबर की हल्की ठंड...और मीठी-सी धूप में...आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही थी।तभी अंदर से फोन की आवाज़ आई... "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन...""कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..."कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी। "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।"हेलो..."एक अनजानी मर्दानी आवाज़ थी।"रोंग नंबर!" – कह कर वो फोन रख कर मुड़ने ही वाली थी,तभी फिर से घंटी बजी... "ट्रिन ट्रिन..."इस बार, महक के 'हेलो' कहने से पहले ही सामने से आवाज़ आई..."फोन मत रखिएगा... आपको कैसे पता कि रोंग नंबर है?"महक थोड़ा चौंकी।"आपकी आवाज़ किसी से मैच