आखिरी चिठ्ठी जो कभी भेजी हीं नहीं गई....? - 2

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​पुरानी रेलवे स्टेशन की वह सुनसान इमारत, जो बरसों पहले किसी हादसे के बाद बंद कर दी गई थी, आज काली परछाइयों का बसेरा लग रही थी। रात के ठीक 12 बज रहे थे। आयरा की टैक्सी ने उसे कुछ दूर पहले ही उतार दिया था क्योंकि ड्राइवर उस "शापित" जगह के पास जाने को तैयार नहीं था।​हल्की बूंदाबांदी अब एक ठंडी चुभन में बदल चुकी थी। आयरा ने अपने कोट को कसकर लपेटा। उसके हाथ में वही सफेद लिफाफा था, जो कल उसके दरवाजे पर मिला था। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, पर मन में एक ही सवाल था—