लेखक -एसटीडी मौर्य ️बस पंक्चर हो जाने के बाद हम तीनों जल्दी-जल्दी पैदल ही रेलवे स्टेशन की ओर चलने लगे। समय बहुत कम बचा था और हमारे मन में बस एक ही चिंता थी—कहीं ट्रेन छूट न जाए।प्रियांशी बार-बार घड़ी देख रही थी और अंकिता भी घबराई हुई थी। मैं उन्हें दिलासा देता हुआ तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था।कुछ देर बाद आखिरकार हमें दूर से रेलवे स्टेशन दिखाई देने लगा। यह देखकर हम तीनों के चेहरे पर थोड़ी राहत आ गई।स्टेशन के अंदर पहुँचते ही हमने चारों ओर देखा। प्लेटफॉर्म पर कुछ लोग इधर-उधर बैठे थे, कुछ लोग