(मशीन का भारी दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो जाता है। बाहर की आवाज़ें कट जाती हैं।)(अंदर—पूरा अंधेरा। कोई स्क्रीन नहीं, कोई बटन नहीं। सिर्फ़ साँसों की आवाज़।)ये कोई लैब नहीं थी…ये तो जैसे दृश्य और अदृश्य के बीच का ख़ालीपन था।(सुनीति अंधेरे में हाथ बढ़ाती है। उंगलियाँ काँप रही हैं।)सुनीति (धीरे से) बोली - “कौशिक जी…आप यहीं हो न?”(कौशिक तुरंत उसे अपनी ओर खींच लेता है।)कौशिक बोला - “मैं यहीं हूँ…और कहीं नहीं जाना।”(वो सुनीति को कसकर सीने से लगा लेता है।)(दोनों की धड़कनें एक-दूसरे में घुलने लगती हैं।)(अंधेरे में सिर्फ़ दिलों की आवाज़।)सुनीति (रोते हुए) बोली - “अगर ये आख़िरी पल हुए