खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 17

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ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"भाग 17: “पलटवार, परछाइयाँ और जागती उम्मीद”रचना: बाबुल हक़ अंसारीलेखक का पैगाम: मेरी खामोशी और आपका इंतज़ार"मेरे अज़ीज़ पाठकों,"आज बहुत दिनों बाद जब मैंने फिर से कलम उठाई है, तो उंगलियों में शब्दों से ज़्यादा एक लंबी खामोशी का बोझ था। यह वही खामोशी है जिसने मुझे इतने दिनों तक आप सबसे और मेरी अपनी कहानियों से जुदा रखा। ज़िंदगी कभी-कभी हमें ऐसे मोड़ों पर खड़ा कर देती है जहाँ हम दुनिया से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के तूफ़ानों और रूहानी अज़ियतों (तकलीफों) से लड़ रहे होते हैं।इन बीते दिनों में सिर्फ मेरी कहानी ही