रात के ठीक 2:17 बजे थे। शहर के पुराने सरकारी अस्पताल का मुर्दाघर फिर से उसी ठंडी खामोशी में डूबा हुआ था, जहाँ पिछली बार सब कुछ खत्म हुआ था… या शायद शुरू हुआ था। डॉ. आरव को उस रात के बाद कई बार नींद में वही दृश्य दिखाई देता था—स्टील की ट्रे, आधा खुला दरवाज़ा, और वह शव जिसकी आँखें अचानक खुल गई थीं। पुलिस ने केस को “मानसिक तनाव” कहकर बंद कर दिया था, लेकिन आरव जानता था कि सच्चाई कुछ और थी। उस रात उसे फिर से कॉल आया। “सर… मुर्दाघर में कुछ गड़बड़ है,” वार्ड बॉय