अदृश्य पीया - 16

  • 609
  • 1
  • 153

(दोपहर। हवेली के बाहर कुछ लोग काग़ज़ों पर साइन कर रहे हैं।सुनीति और कौशिक पास खड़े हैं—अदृश्य।)एक सेठ ने इस हवेली को गैरकानूनी तरीके से बेच दिया था।उन्हें पता था… पर फर्क नहीं पड़ा।सुनीति (शांत स्वर में) बोली - “अब ये घर भी हमारा नहीं रहा…”कौशिक (मुस्कराकर) बोला - “हमारी बॉडी अब किसी जगह से एडजेस्ट होती ही नहीं।”ना दीवारें उनकी थीं, ना छत… बस साथ अब भी उनका था।(सुनीति खिड़की के पास खड़ी है।)सुनीति बोली - “पर मैं देखना चाहती हूँ…कौन आएगा इस घर में।”कौशिक बोला - “हाँ…शायद कोई कहानी फिर से शुरू हो।”(कुछ दिन बाद। एक गाड़ी हवेली के सामने रुकती है।