प्रेम न हाट बिकाय - भाग 40

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40 ----   बड़े दिन हो गए थे आना रंजु के दिए हुए कागज़ निकाल ही नहीं पाई थी| थोड़ी सी फुरसत मिली तो उसने उस रबर से बंधे हुए बंडल को एक बार फिर से खोला | उसकी दृष्टि रंजु के लिखे हुए मैटर पर पड़ी | वह आगे पढ़ने लगी जापान का दृश्य जैसे उसकी दृष्टि में साकार हो उठा — “एक कतार में भागती हुई कारें, उनका एक साथ रुककर फिर से साथ भागऩा--- ऊपर भी, नीचे भी सड़कों के जाल बिछे हुए थे ऐसा लगा कि मैं जादू की नगरी में आ गई हूँ।रात हम टोकियो