27-- “ एक बात नहीं समझ आई ---” बड़े गंभीर स्वर में एक दिन चाय पीते हुए शीनोदा विवेक से बोल पड़ा | “ऐसा क्या है जो नहीं समझे हो, अब तो तुम भारत में काफ़ी दिनों से हो –” “वही तो ---व्हाय पीपल आर सो डुप्लिकेट, कन्फ़्यूज्ड ?” “ये तो सब जगह होते हैं, आखिर मनुष्य के मन की भीतरी भावनाएँ, संवेदनाएँ तो एक सी ही हैं न !क्या जापान में नहीं होते डुप्लिकेट और कन्फ़्यूज्ड लोग ?”विवेक कुछ रुड थे | शीनोदा विवेक से अपने मन की सारी बातें करने लगा था | अनामिका से भी करता था