[36]“प्रात: काल की नूतन ऊर्जा और गुरुजी के आशीष से मैं अपने मार्ग पर चलने को सज्ज हूँ। तुम सज्ज हो न, शैल?”“जी। गुरुजी को प्रणाम कर चलते हैं।”दोनों गुरुजी की तरफ चलने लगे। एक वृक्ष के नीचे गुरुजी किसी ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे। “प्रणाम गुरुजी। हमें अनुमति दें।” “आपका मंगल हो।”दोनों चल पड़े। “रुको।” दोनों रुक गए। “आज आप उस मार्ग पर नहीं चलोगे जहां जाने की आपकी योजना है।”“तो?”“आज विपरीत मार्ग पर जाना पड़ेगा आपको।”“अर्थात?”“अपने कार्यालय लौटना पड़ेगा।”“वह तो हमारा लक्ष्य नहीं है। उस मार्ग पर तो. . ।”“उस मार्ग से ही लक्ष्य का मार्ग निकलेगा। बस लौट जाओ।” “कैसे गुरु