अदृश्य पीया - 14

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(रात। कमरा शांत है। टेबल पर ग्रंथ खुला है, पास ही कौशिक का चश्मा।)(सुनीति खिड़की के पास खड़ी है। चेहरे पर डर नहीं… एक अडिग फैसला।)जब इंसान तय कर ले कि वो क्या खोने को तैयार है—तब डर पीछे छूट जाता है।(सुनीति पलटती है। कौशिक पास खड़ा है, घबराया हुआ।)कौशिक बोला - तुम कुछ छुपा रही हो…मैं महसूस कर सकता हूँ।सुनीति (धीरे, पर मज़बूती से) बोली - मैं सच छुपा रही हूँताकि आप बच सकें।कौशिक (आवाज़ टूटती हुई) बोला - मैंने मना किया था…सुनीति (हाथ पकड़कर) बोली - और मैंने शादी में वादा किया था—हर हाल में आपके साथ रहने का।(कौशिक कुछ नहीं कह