मै मन - 1

  (जीवन का प्रत्यक्ष विज्ञान-दर्शन — वेदांत 2.0)                  अज्ञात  अज्ञानी    मन स्वयं आनंद है, स्वयं ब्रह्म है। बस उसे कर्ता से द्रष्टा बना दो—कर्ता नहीं बचता। यही द्रष्टा प्रेम है, आनंद है। तब मन स्थिर होता है, ऊर्जा बहती है—प्रेम, करुणा, दया, सेवा अपने आप प्रकट हो जाते हैं। सबसे बड़ा भय यही है— “अगर द्रष्टा बन गया तो संसार कहाँ जाएगा? मेरी हासिल की गई चीज़ें, मेरी इज्जत, मेरी जीत—इनका क्या होगा?” यही दुविधा बंधन है। मन का काम देखना और बोध कराना है, प्रतिक्रिया देना नहीं। बाक़ी काम बुद्धि,