2---- आज विवेक का जन्मदिवस था और अकेली बैठी वह गुज़रे रास्तों की धूल फाँक रही थी, आँसुओं की लड़ियाँ मोतियों सी उसके गालों पर फिसल रही थीं | एक समय ऐसा होता है जब सब अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं और पीछे छुटी हुई अकेली ज़िंदगी के पास धुंध भरी गहराती गलियों में चक्कर काटने के अलावा कोई चारा नहीं रहता |एकाकीपन कुछ ऐसे चुभने लगता है जैसे कोई बहुत बारीक काँच जो हाथ से छूट जाता है और उसकी किरचें शरीर से अधिक मन की दीवार में भीतर और भीतर जाकर चुभती