माँ की आखिरी चिट्ठी: एक अमर बलिदानगाँव की वह पुरानी हवेलीनुमा घर, जिसकी दीवारों से चूना झड़ रहा था, आज अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए थी। बाहर सावन की झड़ी लगी थी। बादलों की गर्जना और खिड़की के कांच पर टकराती बारिश की बूंदें ऐसी लग रही थीं, मानो प्रकृति भी किसी गहरे शोक में डूबी हो। रमेश अपनी धुंधली आँखों से बाहर देख रहा था, पर उसे कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। उसके हाथ में एक पीला पड़ चुका लिफाफा था—माँ की आखिरी चिट्ठी।आज माँ को गए तीन साल बीत चुके थे, लेकिन रमेश के लिए