द्वारका जाने के रास्ते में दोपहर ढल चुकी थी।कुँवर प्रताप, राजपुरोहितजी और उनके कुछ साथी एक छोटे से गाँव के बाज़ार में रुक गए।थोड़ी देर के लिए सबने अपने घोड़े रोक दिए ताकि लोग पानी पी सकें और आराम कर लें।गाँव का माहौल बहुत सादा था मिट्टी की गलियाँ, इधर-उधर बच्चे खेल रहे थे, और औरतें चूल्हे के पास बैठी बातें कर रही थीं।कुँवर प्रताप घोड़े से उतरे ही थे कि उनकी नज़र एक छोटे बच्चे पर पड़ी।वह बच्चा धीरे-धीरे प्रताप के घोड़े के पास जा रहा था, उसे छूना चाहता था लेकिन डर के मारे हाथ पीछे खींच लेता।कुँवर