शाम के पांच बज रहे थे। सूरज की सुनहरी किरणें अब नारंगी होकर खिड़कियों से विदा ले रही थीं। घर में एक अजीब सी शांति थी—वह शांति जो किसी बड़े तूफान से पहले या किसी थके हुए दिन के ढलने पर महसूस होती है। काया रसोई में खड़ी थी, उसने अदरक कूटने वाली ओखली उठाई ही थी कि उसे ख्याल आया। उसने अपना फोन उठाया और भूपेंद्र का नंबर डायल किया।भूपेंद्र उस वक्त दफ्तर में अपनी मेज पर फाइलों के ढेर के बीच घिरा हुआ था। कंप्यूटर की स्क्रीन देखते-देखते उसकी आँखों में जलन होने लगी थी। तभी उसका फोन