किराए का पति समझौते से सुकुन तक

किराए का पति: समझौते से सुकून तकअध्याय 1: पटना की शाम और माँ की ज़िदपटना की गलियां शाम होते ही शोर और धूल से भर जाती हैं। बोरिंग रोड के एक छोटे से फ्लैट की बालकनी में खड़ी नेहा अपनी चाय का कप थामे डूबते सूरज को देख रही थी। शहर की रोशनी जगमगा रही थी, लेकिन उसके मन में एक अंधेरा सा था। तभी फोन की घंटी बजी—'माँ'।नेहा ने एक गहरी सांस ली और फोन उठाया। "हाँ माँ, नमस्ते।""नमस्ते-वमस्ते छोड़, ये बता शादी कब कर रही है?" माँ की आवाज़ में हमेशा की तरह वही तेज़ी और चिंता थी।