श्रापित एक प्रेम कहानी - 42

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वर्शाली अपना हाथ आगे करके फिर वही मंत्र कहती है---“ॐ सुप्त-शक्ति जागर्ति — रोगः क्षीणो भवतु।वरोऽस्मिन् द्रवणे आरोग्यम् पुनरुत्थापय।”देखते ही देखते वो मणि वर्शाली के हाथ में आ जाती है। वर्शाली एकांश से कहती है---वर्शाली : - एकांश जी यही है सांतक मणि जिनसे पाने के लिए बहुत सारे मनुष्य परी साधना करता है। पर फिर भी उन्हे इस मणि के दर्शन नहीं होती। एकांश मणि को हैरानी से देख रहा था और फिर कहता है---एकांश :- क्या ये मणि सच में सबकी मनोकामना पूरी करता है ? वर्शाली :- हां एकांश जी सबकी । क्यों एकांश जी आपकी कोनसी मनोकामना है