खामोशियों का इकरार

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1वो शहर, जहाँ गलियाँ यादें छुपाती नहींउस शहर की हवा में कुछ अटका हुआ था।शायद कोई अधूरी चीख़…या कोई ऐसा सच, जिसे कभी दफ़नाया नहीं गया।आयरा को बचपन से खिड़कियों से लगाव था।उसे लगता था, खिड़कियाँ झूठ नहीं बोलतीं।दीवारें इंसान को धोखा दे सकती हैं,लेकिन बाहर की दुनिया…हमेशा सच दिखा देती है।हर रात वो उसी खिड़की के पास बैठती।नीचे वही सड़क।वही मोड़।और वही स्ट्रीटलाइट—जिसकी पीली रोशनी मेंतीन साल पहलेएक ज़िंदगी खत्म हुई थी।लोग कहते थे वो हादसा था।पुलिस ने भी यही कहा।लेकिन आयरा जानती थी—कुछ हादसे, दरअसल गुनाह होते हैं,बस उनमें हथियार नहीं होते।उस रात भी बारिश हो रही थी।बूँदें