प्रार्थना और परीक्षा

  • 114

यह कहानी उस लड़की की है जो बाहर से जितनी सामान्य दिखती थी, अंदर से उतनी ही उलझी हुई थी। बचपन से ही उसके मन में एक बात साफ़ थी—उसे अपनी कहानी खुद लिखनी है। किताबों में नहीं, शब्दों में नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी के फैसलों में।वह अंडरकॉन्फिडेंट थी। यह उसने कभी खुलकर कहा नहीं, लेकिन महसूस हमेशा किया। हर कदम पर उसे खुद को समझाना पड़ता था कि वह कर सकती है। पढ़ाई में वह अच्छी थी, इसलिए उससे उम्मीदें जुड़ती चली गईं। परिवार को लगता था कि वह आगे बढ़ेगी, कुछ बड़ा करेगी। और सच कहें तो उसके