अधुरी चिट्ठी

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अधूरी चिट्ठीगांव के किनारे बसे एक छोटे से घर में राधा मैया रहती थीं। उम्र हो चली थी उनकी – साठ के पार। चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखों में आज भी वही चमक जो बचपन में बेटे को गोद में लोरी सुनाते हुए जगमगाती थी। बेटा, रामू, शहर चला गया था दस साल पहले। नौकरी लग गई थी मुंबई में। "मैया, मैं कमाऊंगा, बड़ा घर बनवाऊंगा, फिर तुम्हें बुला लूंगा," कहकर चला गया था। लेकिन साल बीतते गए, फोन कम होते गए, और चिट्ठियां तो कभी आई ही नहीं।राधा मैया रोज शाम को चौपाल पर बैठतीं। हाथ में पुरानी