कशिश

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कशिशबालों को समेटती हुई l पल्लू से पसीना पहुंचती हुईl मंद मंद मुस्कुराहट के साथ खिड़की खोले हवा को महसूस कर रही थीl सुडोल लहराई वह बदन एक निराली अदाl दिल में कशिश लिए हुए मग्न सुद ख़ो ऐ l निहार लूं मैं उसे बस यूं ही बिना आहट के देखता रहूंl नंदिता आवाज देकर पुकारा इधर आओ बेटा चौक ती हुई आई मां जैसे बरसों गई मां ने आवाज दी होl आंखों में आंसू ले आईl दरवाजे पर तुम नजर तुम यहां कब से खड़े थेजी मैं प्रेस के कपड़े लाया हूं बाबू जी ने भेजे हैंl नंदिता बिटिया