दोस्त

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  दर-बदर भटकते हुए मंगरू अब हिम्मत हार चुका था ,उसके हाथ में कई बार मुड़ा और फटा कागज इस बात की गवाही दे रहा था कि वह कागज उसके पास कई दिनों से पड़ा हुआ था, उसमें किसी का नाम-पता लिखा था शायद। मंगरू जिसके भी सामने वो कागज खोलता, वो नाक सिकोड़ कर आगे बढ़ जाता, मतलब कोई भी उस पत्र को पढ़ने तक की भी जहमत नहीं उठाता था।सुर्यदेव उग्र रूप धारण किए हुए थे,, गर्म हवा ने मंगरू के अंजर-पंजर ढीले कर दिए थे। मंगरू थका-मांदा था, उसने पेड़ के नीचे रखे मटके का पानी पीकर