तपस्विनी

  • 2.1k
  • 648

तपस्विनीलेखक राज फुलवरेदिशाएँ उस दिन असामान्य रूप से शांत थीं. सूर्य ढलने को था, पर उसकी किरणें जंगल के विस्तृत फलों, लताओं और अनगिनत पत्तों पर ऐसा बिखर रही थीं जैसे पूरा वन सोने की चादर ओढ रहा हो. हवा में मिट्टी की सुगंध थी, और पंछियों की अंतिम संध्या- ध्वनि वातावरण को एक दिव्य लय दे रही थी.इन्हीं शांत ध्वनियों के मध्य एक युवती आगे बढ रही थी—तपस्विनी.उसके पैरों में चप्पल नहीं थी, पर उसकी चाल इतनी हल्की थी कि लगता था मानो धरती खुद उसका मार्ग बनाती जा रही हो. उसके चारों ओर एक सूक्ष्म आभामंडल उत्पन्न हो