प्रेम, प्यार, इश्क

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एक दिन अर्थ ने मुझसे अपने पहले प्यार का जिक्र किया | मैं गुमसुम हो गयी, न जाने क्यों ?पर क्या सच ही कोई कारण न था ?कारण था सुप्त भावनाओं का दबाव !मधुर स्मृति की धमक !विवश आंसू! कितनी आसानी से पुरूष अपने प्रेम का जिक्र कर लेते हैं |वे उसे अपनी गौरव गाथा समझते हैं| पर क्या स्त्री के लिए भी उतना सहज होता है अपने प्रेम का जिक्र करना ....उसे स्वीकारना, निभाना!नहीं ...कदापि नहीं |पुरूष अपने प्रेम की असफलता का श्रेय अपने प्रेमिका को देकर किसी अन्य से प्रेम करने लगता है ,इसमें उसे कोई अपराध-बोध नहीं