बिकी हुई लड़कियां नीला प्रसाद (1) मैं उसके घर के दरवाजे के सामने खड़ी हूं. दूसरे तल्ले के उसके घर के बाहर तक सीढ़ियां लांघकर नहीं, अंदर उमड़ती लहरों को चीरकर पहुंची हूं. अलग-अलग किस्म की भावनाएं, साझा सुख- दुख, बातें, सलाह, आंसू, हंसी और गलतफहमियों की यादों की अंदर उमड़ती लहरें.. और यह अहसास कि हर बार उन सबों को लांघकर ज्यादा करीब होते गए थे हम दोनों! पर अभी तो बीच में इतने बरसों का मौन पसरा था. नहीं, अनबोला नहीं, बस अपनी- अपनी व्यस्तताओं में इस कदर खोया जीवन कि कभी- कभी फोन पर औपचारिक बातें भले