स्वाभिमान - लघुकथा - 4

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आज शीला की शादी का दिन था। पिछले सात महीनों से वैभव उसके प्रति जिस प्यार का इजहार करता आ रहा था, उससे शीला भी बहुत खुश थी। इतना बड़ा घर और पढ़ा- लिखा लड़का, उसे तो खुद से खुशनसीब कोई नजर ही नहीं आ रहा था। फेरो के समय उसने कनखियों से वैभव को देखा तो वह भी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था ।पंडितजी के मंत्री चल रहे थे और वह अपने भविष्य के सपने बुन रही थी । अचानक रूक जाओ शब्द ने उसकी तल्लीनता भंग कर दी। वैभव के पिता कह रहे थे , हमारे घर की परंपरा है कि लड़की वाले जब 50 हजार रुपये देते हैं तभी लड़का फेरों के लिए पैर आगे बढ़ाता है।