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ईश्वर ने जानवरों की तुलना में हम मनुष्यों को सोचने-समझने की शक्ति कहीं अधिक दी है और इस शक्ति प्रयोग हमें निरंतर विकास और प्रगति ओर करना चाहिए। मगर हम इसका प्रयोग अपने लिए छोटे-छोटे झूठ-मूठ के बंधनों को तय करने और उनका निर्वाह करने में लगा रहे हैं।