आज जब मैं खुद को आईने में देखती हूँ, तो कुछ अलग-सा महसूस होता है। आईने में चेहरा तो वही दिखाई देता है, लेकिन लगता है जैसे जीवन में न जाने कितने बदलाव आ गए हैं। एक समय था, जब लोग एक साथ बैठते थे, परिवार की तरह रहते थे। एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते थे। रिश्तों में अपनापन था और लोग सामाजिक तथा व्यवहारिक भी थे। किसी के सुख-दुःख में साथ खड़े होना स्वाभाविक था। लेकिन आज चारों ओर देखती हूँ तो बहुत कुछ बदला हुआ दिखाई देता है। जैसे किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं रहा। क्या यह बदलाव नई पीढ़ी का है?
आईने में बदलता जीवन - भाग 1
भाग – 1आईने में बदलता जीवनआज जब मैं खुद को आईने में देखती हूँ, तो कुछ अलग-सा महसूस होता आईने में चेहरा तो वही दिखाई देता है, लेकिन लगता है जैसे जीवन में न जाने कितने बदलाव आ गए हैं।एक समय था, जब लोग एक साथ बैठते थे, परिवार की तरह रहते थे। एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते थे। रिश्तों में अपनापन था और लोग सामाजिक तथा व्यवहारिक भी थे। किसी के सुख-दुःख में साथ खड़े होना स्वाभाविक था।लेकिन आज चारों ओर देखती हूँ तो बहुत कुछ बदला हुआ दिखाई देता है। जैसे किसी को किसी से कोई मतलब ...और पढ़े
आईने में बदलता जीवन - भाग 2
तीसरी कक्षा में पहुँचते-पहुँचते विभा के मन में एक सवाल उठने लगा—“हमें पढ़ना क्यों जरूरी है?”वह सोचती, आखिर सभी एक जैसे क्यों नहीं होते?कुछ बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे। उनके टेस्ट में अच्छे अंक आते, शिक्षक उनकी प्रशंसा करते और वे हर काम जल्दी सीख लेते। लेकिन विभा के साथ ऐसा क्यों नहीं था?उसके मन में बार-बार यही सवाल उठता—“मेरे नंबर दूसरों से कम क्यों आते हैं? मैं दूसरों की तरह होशियार क्यों नहीं हूँ? मैं उनसे पीछे क्यों रह जाती हूँ?”यह सवाल धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगा।वह किसी से कुछ कहती नहीं थी। अपनी परेशानी ...और पढ़े