यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

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                        : प्रकरण 25 :कहते हैं हर किसी क़े दिमाग़ में कुछ ना कुछ हर पल, हर घड़ी चहल पहल होती रहती हैं. दिमाग़ बिना सोचे एक पल भी रह नहीं सकता.मेरा भी कुछ ऐसा हाल था.मेरा दिमाग़ भी हर पल कुछ ना कुछ यादों की सहेलगाह में व्यस्त रहता था.मेरी जिंदगी में कई लोग आये थे, जिस की याद बार बार आती रहती थी.मेरी याद दास्त भी बड़ी तेज थी. कुछ भी चीज मानो फेविकोल की तरह मेरे दिमाग़ में घुसकर पूरी तरह चिपक जाती थी, जिसे मैं