उस रात विनय के सामने एक खाली कागज था और भीतर सवालों का पूरा जंगल।बाहर बारिश हो रही थी। छत से टपकती बूँदें किसी पुराने गीत की तरह एक ही लय में गिर रही थीं। मेज पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी और कमरे की दीवार पर टँगी घड़ी रात के बारह बजने का संकेत दे रही थी।विनय ने कलम उठाई, कागज पर तारीख लिखी और फिर रुक गया।वह कई वर्षों से कहानियाँ पढ़ता आया था। कभी प्रेमचंद के पात्रों में अपना गाँव खोजता, कभी गुलज़ार के शब्दों में अपने मन की उदासी। उसे लगता था कि दुनिया में