कविता (1) प्रेम का तारापथिककोरात में अंबर के करोड़ों टिमटिमाते तारों के मध्यदिखते हो तुम बिलकुल एक अलग चमकते तारे,उस अँधेरे के राही कोराह दिखाते।तुम्हें पता नहीं शायदवह तुम्हें ही देखकरलगाता है अनुमानदिशाओं का।रात के अँधेरे में टटोलकर बढ़ता,घुप अंधकार भरी राह मेंमार्ग ढूंढ़ता।रात भरवह यूँ ही चलता है,और मार्ग ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हीसुबह हो जाती है।भोर हो जाने परमार्ग ढूंढ़ना भी आसान होता हैसाथ देने वाले भीमिल जाते हैं,मगरदिन के उजाले सेअधिक प्रिय है उसे,वो अँधियारी रात,जब तुम उसे साफ दिखाई देते हो।अंबर में तारों की भीड़ में भीवह रोज तुम्हें ढूँढ़ लेता है,तुम्हें ही महसूस करता है।ठीक उस तरहजिस तरह उस दिन सबसे पहलेउसने तुम्हें देखा