राजसभा

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राजसभा-१कौरव-प्रतिनिधि दुर्योधन थापांडव युधिष्ठिर के साथ खड़े थे,भीष्मपितामह, गुरुजन भीउसी सभा में बैठे थे।राजसभा के भीतर झाँकाद्यूतक्रीड़ा के पासे थे,अनैतिक इस क्रीड़ा केमूकदर्शक सब महारथी थे।द्रौपदी तो अग्निगर्भा थीहवन उसी में होना था,महाभारत की नींव वही थीराजा अंधा, पुत्रमोह था।श्रीकृष्ण तो सूक्ष्म बने थेविराट अक्ष घूम रहा था,बुद्धि भ्रष्ट थी,इधर-उधर थीजब राजसभा में द्यूत चला था।राजसभा-२पासा शकुनि के धूर्त हस्त में  द्वापर  का अंश शकुनि था,दुर्योधन विनाश का पहियाकलियुग उसके मन में था।शकुनि के पासे मेंआत्मा जीत की बैठी थी,उसने जो अंक माँगावही खुल कर आत था।द्रौपदी एकान्त में बैठीवह अग्नि से पैदा थी,दूषित मन के पास उसेखींच दुशासन लाया था।क्यों