कविता: (1) प्रेम का छतनार वृक्षप्रेम का निःशब्द बीजबोया जाता है अंतस्तल में,ताकि अंकुरित हो सके,प्रेम का पौधाऔर शाखाएं फूटे इससे अगणितकि लहलाने लगे प्रेम,धरती में इस ओर से उस ओरऔर आकाश में सदैव दिखाई देने वालेध्रुव तारे की तरह,और पूरी धरती पर आच्छादितइस प्रेम के आनंद-फल कोमीलों दूर से भीहृदय चख सकेऔर महसूस कर सकेउस अव्यक्त प्रेम कोजो कृष्ण ने किया था राधा सेऔर जो युगों की सीमा का अतिक्रमण करपहुंचा राधा तक।और फिर जैसे समय एक हो जाता है।मीरा द्वापर में पहुंचती हैं और कृष्ण आ जाते हैं कलियुग में।कविता (2) कविता:प्रेम होता है केवल प्रेमइसका कोई रूप नहीं,इसका कोई