प्रथम अध्याय: अनकहे अल्फाज़ और रात का सन्नाटारात के ढाई बज रहे थे। कमरे की खिड़की से आती हल्की ठंडी हवा के झोंके और दीवार पर टंगे पुराने क्लॉक की टिक-टिक के अलावा, वहाँ चारों तरफ गाढ़ा सन्नाटा पसरा हुआ था। मेज पर रखी जलती हुई मोमबत्ती की लौ हवा के हल्के झोंके के साथ थोड़ा कांप रही थी। उस लौ की मद्धम पीली परछाई आरुषि के चेहरे पर पड़ रही थी, जिसके लंबे काले बाल उसके कंधों पर बिखरे हुए थे और उसकी आँखें किसी अनकहे दर्द की गहराइयों में डूबी थीं। आरुषि के हाथ में एक पुराना फाउंटेन पेन