DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 7

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पुराने ज़ख्म ताजा होकर तकलीफ़देह बन जाते है। अम्मा साहब भी इस वक़्त उसी तकलीफ़ में थीं, लेकिन उनके पास इतना वक़्त नही की उस बात का दुख मनाए। अम्हेल की बातें और उसका जवाब उनके दिल को रेज़ा-रेज़ा करने की कोशिश में लगा हुआ था लेकिन कर नहीं पा रहा था। शेख़ बाबा और मुंशीजी के आते ही उन्होंने अपने आप को पुराने दिनों से बाहर निकाल लिया। उनके पास अब उनके लिए वक़्त कहां था, उन्होंने तो मीरास महल की ज़िम्मेदारी के तले कबका सब भुला दिया था। उनके लिए तो मीरास महल उनकी अज़ीयत से ज़्यादा अहम हो