भाग : 08सुबह की किरणें धीरे-धीरे धरती पर अपना उजास बिखेर रही थीं। रात का घना अंधकार अब छँट चुका था। पेड़ों की पत्तियों पर ठहरी ओस की बूँदें सूर्य की पहली किरणों में चमक रही थीं।अंधकार और अज्ञानता एक-दूसरे के प्रतीक जैसे लगते हैं। दोनों ही अवस्थाओं में मनुष्य की दृष्टि के सामने सत्य होते हुए भी उसका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हो पाता। प्रकाश बाहर हो या भीतर—दृष्टि तभी सार्थक होती है, जब उसे देखने का विवेक भी जागृत हो।तापस दा के घर के मिट्टी के बरामदे में श्री रावण दा और लाल दा के चारों ओर कुछ लोग