रिश्तों की डोर

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रिश्तों की डोरएक अहसास… एक तड़प… और ज़िंदगी का एक कड़वा सचलेखककान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'--- प्रस्तावना ज़िंदगी बहुत अजीब है…जब हम छोटे होते हैं, तब हमें लगता है कि माँ-बाप के बिना हम कुछ नहीं।फिर हम बड़े होते हैं…हमारे सपने बड़े होते जाते हैं।नई पढ़ाई… नई नौकरी… नया घर… विवाह… बच्चे… पैसा… प्रतिष्ठा…और इसी भागदौड़ में जाने-अनजानेहम उन हाथों को भूलने लगते हैं,जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर हमें चलना सिखाया था।माँ की आवाज़ धीरे-धीरे फोन की घंटी तक सिमट जाती है।पिता का इंतज़ार दरवाज़े की चौखट तक रह जाता है।और रिश्ते…जो कभी हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत थे,धीरे-धीरे हमारी व्यस्त