चलो दूर कहीं..27प्रतीक्षा, शिखा को ऐसे घूर रही थी जैसे उसे पहली बार देख रही हो..! वह उसकी बचपन की दोस्त थी, दोनों साथ-साथ खेले कूदे,पढ़े- लिखे और बड़े हुए। दोनों लंगोटिया यार थे । "फिर क्या कोई अपने बचपन के अभिन्न मित्र को भूल सकता है?" प्रतीक्षा को एकटक घूरते देख शिखा के मन में ये प्रश्न कौंधा तो उसने उसे झकझोरते हुए कहा," क्या हुआ प्रतीक्षा.. ऐसे आंखें फाड़े क्यों घूर रही हो..? मुझे पता है मेरे मांग में सिंदूर और इस मंगलसूत्र को देखकर तुम शॉक्ड हो क्यों..?""कौन हो तुम..?" प्रतीक्षा ने धीरे से पूछा तो शिखा