अपराजिता

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कहानी - अपराजितासंध्या का समय था। दिन ढल चुका था, अंधेरा अभी पूरी तरह बना नहीं था। अपराजिता, जिसे सब प्यार से सुहानी कहते थे, बेचैनी से हॉल में इधर-उधर टहल रही थी। उसके पति रोहन अभी ऑफिस से आए नहीं थे। बार-बार घबराहट में वह घड़ी देख रही थी। मन में अजीब-अजीब विचार आ रहे थे। आज रोहन को आने में बहुत देर हो गई थी।तभी डोरबेल बजी। उसने दौड़कर दरवाजा खोला। रोहन मुंह लटकाए खड़ा था। बैग कंधे पर था, चेहरा उतरा हुआ और आँखें थकी हुईं।सुहानी ने घबराते हुए पूछा - "क्या हुआ रोहन, सब ठीक है